Archive for अगस्त, 2007

क्या है वास्तविक शाकाहार?

शाकाहार आजकल शाकाहार का प्रचलन बहुत तेजी से बढ़ रहा है, और कुछ ऐसे भी लोग हैं जोकि शाकाहारी थे मगर अब मांसाहारी होते जा रहे हैं। और आश्चर्य की बात ये है कि यह दोनो ही परिवर्तन जागरुकता के कारण हो रहे हैं। लेकिन हमें अपनी जागरुकता थोड़ी और बढ़ानी चाहिए, क्योंकि असली समस्या कुछ और ही है। वो समस्या गम्भीर-विचार करने योग्य, लेकिन इसी से जुड़ी हुई है। शाकाहार या मांसाहार गंभीर विचार का विषय नहीं है। क्योंकि हमारा धर्म हमें इसके लिए बाध्य नहीं करता। गंभीर विचार का असली विषय है गौ-मांस। और यह बात सिर्फ शास्त्रों की भी नहीं, यह बात है हमारी मान्यताओं की, संस्कारों की। हमारे संस्कार ऐसे हैं कि हम हिन्दू (सनातन) गौ-मांस (गोमास) नहीं खा सकते। मेरा मुख्य उद्देश्य लोगो को शाकाहार के प्रति प्रोत्साहित करना नहीं, बल्की हिन्दू-मुस्लिम भाइओं को गाय-सूअर के मांस से बचने के लिए जागरूक करना है। क्योंकि राष्ट्र की रक्षा के बाद हमारा प्रथम कर्तव्य अपने धर्म की रक्षा करना है। जितना मांस-मच्छी खाना है खाओ, हमारे आपके धर्म पर कोई फर्क नहीं पड़ता। हां, हिन्दुओं को ऐसे जीवों का मांस नहीं खाना चाहिए जिनकी पाँच अँगुलियां होती हैं। जैसे बन्दर-कुत्ता आदि और मुसलमानो को सिर्फ हलाल का मांस ही खाना चाहिए ये तो सब भली-भांति जानते ही हैं। लेकिन हिन्दुओं के लिए तो ये बेहतर होगा कि स्वयं को जितना हो सके, उतना अधिक शाकाहारी बनाने की कोशिश करें। अगर किसी हिन्दू परिवार की संस्कृति/परम्परा में ही मांसाहार शामिल हो तो मैं नहीं कहता कि आप किसी के कहने पर मांसाहार छोड़ दें। आप स्वयं या परिवार की सहमति से निर्णय लें; क्या सही और क्या गलत है। क्योंकि कुछ हिन्दू परिवारो में मांसाहार उनके धर्म से जुड़ा हुआ है। क्योंकि हिन्दू धर्म में पशु बली की प्रथा अभी समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जो लोग शाकाहारी परिवार से हैं या शाकाहार करते हैं उन्हें मांसाहार आरम्भ नहीं करना चाहिए। जेलेटिन (सरेस या श्लेश) हमारे विदेशी मित्रों की बदौलत आजकल हम मूर्खों के बाज़ार में ऐसे बहुत से उत्पाद हैं जोकि गाय और सूअर के मांस से बने हैं। गलती शत-प्रतिशत हमारी है, क्योंकि बाज़ार में ये सब चोरी छुपे नहीं बिक रहा। लेकिन हमने ही अपनी आँखें बन्द कर रखी हैं, हमने कभी जानने की कोशिश ही नही की। मगर अफ़सोस कि बात यह है कि इसका सम्बन्ध हिन्दू और मुसलमान धर्म से है और आम हिन्दू और मुसलमान यह नहीं जानते। इसलिए उत्पादों को प्रयोग करते हैं या खाते हैं। जैसे कि “जेलेटिन” इसका प्रचल आजकल बहुत बढ़ गया है और बढ़ता ही जा रहा है। लेकिन आम आदमी यह नहीं जानता कि जेलेटिन (gelatin or gelatine) गाय और सूअर की हड्डी-खाल से बनता है। ग्लिसरीन और पेपसिन भी ज्यादातर जेलेटिन की तरह ही गाय-सूअर से बनते हैं। इसी प्रकार के और बहुत से रसायन जोकि वास्तव में पशु के शरीर से बने हैं; कुछ-एक शुद्ध शाकाहारी आइस-क्रीमों में भी पाये जाते हैं। बहुत-से साबुन भारतीय बाज़ार में पशुओं की चर्बी से युक्त हैं, जिनमें से कुछ अत्यन्त लोकप्रिय हैं। बहुत-से लोकप्रिय टूथ-पेस्ट भी ग्लिसरीन से युक्त हैं और ग्लिसरीन पर आँखें मून्द कर विश्वास नहीं किया जा सकता। क्योंकि ग्लिसरी भी वास्तव में जेलेटिन का ही दूसरा रूप है। गाय और सूअर की हड्डी और खाल को पानी में उबालने पर जो जेल जैसी परत ऊपर तैरती हुई बनती है, उसे जेलेटिन और उससे निचली परत को ग्लिसरीन कहते हैं। हालांकि पॆट्रोलियम से भी ग्लिसरीन बनाई जाती है। आप भली-भाँती जानते हैं वर्ना थोड़ा याद करके देखिये, हम ऐसी बहुत-सी दवाइयां खा चुके हैं या खाते हैं जोकि जेलेटिन से कोटेड हैं। आयुर्वेदिक औषिधी भी इससे अछूति नहीं है। मेरे व्यक्तिगत पूछने पर एक प्रतिष्ठित कंपनी (भारत की सुप्रसिद्ध या कहें तो अन्तर-राष्ट्रीय स्तर पर भारत की सबसे प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक दवा बनाने वाली संस्था) ने उत्तर में लिखित जवाब दिया कि “फिलहाल, स्थानीय (भारतीय) बाज़ार में हम सख़्त जेलेटिन कैप्सूल का प्रयोग करते हैं, उस जेलेटिन कैप्सूल में गोवंश की हड्डीयों से बना औषधीय स्तर का जेलेटिन होता है”। लेकिन सबसे प्रतिष्ठित आयुर्वेदिक कंपनी की गौमांस-युक्त (गोवंश जेलेटिन) आयुर्वेदिक दवाएं मैने देखी हैं, उन पर नॉनवेज़ का कोई निशान नही है। लेकिन दवा पर जहां शामिल (ingredients or contains) आयुर्वेदिक औषधियों (घटकों) के नाम व मात्राएं लिखी होती है वहां जेलेटिन लिखा है। कोई उत्पाद यदि नॉन-वेज़ जेलेटिन से युक्त है तो कम-से-कम उस उत्पाद पर नॉन-वेज़ की मुहर तो हो। मैं समझता हूँ कि सभी उत्पादकों को इसका ध्यान रखना चाहिए। रैनबक्सी की जेलेटिन कैपसूल (जेलेटिन-कोटेड) पर बाक़ायदा नॉन-वेज़ का चिह्न बना हुआ है। क्योंकि उन्होने कैपसूल की कोटिंग के लिए मासाहारी जेलेटिन का इस्तेमाल किया है। धन्यवाद ऐसी कंपनियों का जो कम-से-कम नॉनवेज़ की मुहर तो लगा रही हैं। हालांकि शाकाहारी जेलेटिन भी होती है, मगर बहुत मंहगी होती है, क्योंकि यह शाकाहारी जेलेटिन किसी ख़ास समुद्री घास से बनती है। शाकाहारी जेलेटिन को “कैराज़ीन या ज़ेलोज़ोन” कहते हैं। जोकि अधिकतर “अगर-अगर” नामक समुद्री वनस्पति से बनती है। जबकि साधारण जेलेटिन बूचड़-खाने की फेंकी हुई बेकार की या बहुत सस्ती, बड़ी-बड़ी हड्डीयों और छोटे-छोटे चमड़े के टुकड़ों वगैरा से बनती है। कुछ लोग हिन्दू और मुसलनों की धर्मिक भावनाओं का ख़्याल रखते हुए मछली से भी जेलेटिन बनाते हैं। लेकिन इसे या शाकाहारी जेलेटिन को ख़रीदने के लिए शायद आपको अमेरिका जाना पड़े। क्योंकि शाकाहारी जेलेटिन बहुत मंहगी होती है इसलिए या तो अमेरिका वोलों के लिए ही बनी है या अमेरिकन ही उसे खरीदने की छमता रखते हैं। पिज़्ज़ा या पीज़ा (हार्ड-चीज़) पश्चिमी फैशन के मारे हुए हमारे हिन्दू भाई बड़े शौक से वेज़ पीज़ा खाते हैं। क्योंकि पीज़ा पर शाकाहार की हरी मुहर लगी होती है। लेकिन बिचारे मासूम ये नहीं जानते कि “वेज़ पीज़ा” नाम की कोई वस्तु इस संसार में है ही नही। क्योंकि पीजा के ऊपर चिपचिपाहट के लिए जो हार्ड चीज़ बिछाइ जाती है, उस हार्ड चीज़ में गाय की आँतें मिली हुई होती हैं। गाय की आँत डाले बिना हार्ड-चीज़ चिपचिपी नहीं बन सकती। पनीर या छैना को गाय की आँतों में पकाने से ही हार्ड-चीज़ बनती है, दूसरा कोई उपाय नहीं है। और बिना हार्ड चीज़ के कोई भी पीज़ा नहीं बन सकता अर्थात् सभी पीज़ा नॉन-वॆज़ (गाय के मांस से युक्त) होते हैं। चिपचिपाहट के आलावा भी और बहुत से कारण है कि हार्ड चीज़ गौमांस युक्त होती है। सबसे पहले तो दूध को अधिक चर्बी-युक्त बनाने के लिए दूध में गाय की चर्बी मिलाते हैं फिर दूध से पनीर बनाने के लिए बछड़े की आँते दूध में डालते हैं; फिर पनीर को चीज़ में बदलने के लिए गाय की आँतें उसमें डालते हैं। फिर वह हार्ड-चीज़ सुगठित दिखे इसके लिए गाय की हड्डी का चूर्ण हार्ड-चीज़ में मिलाते हैं। इसके आलावा और बहुत-सी उत्पादन की बारीकियाँ है जिसके लिए गौमांस हार्ड-चीज़ में मिलाना जरूरी होता है। यदि पीजा घर में बनाया जाए तो शाकाहारी भी हो सकता है। क्योंकि हम हार्ड-चीज़ की जगह पर कोई/किसी दूसरी चीज़ का प्रयोग कर सकते हैं। लेकिन हार्ड-चीज़ के आलावा अन्य चीज़ भी ज्यादातर गौमांस युक्त है। भारत में शायद अभी संभव नहीं है लेकिन विदेशी बाज़ार में इटली की “मासकरपोने क्रीम-चीज़” मिल जाती है जोकि केवल दुग्ध उत्पाद से बनी है (मासकरपोने आम चीज़ से 4-5 गुना मंहगी होती है)। मैं कई सालों से ऐसी चीज़ की तलाश में हूँ, मुझे इसके आलावा दूसरी कोई चीज़ या चीज नहीं मिली। हर चीज़ में जाने-अंजाने या वज़ह-बेवज़ह गौमांस है। कुछ ऐसी चीज़ कंपनी भी हैं जो गाय की आँतो के साथ-साथ गाय की हड्डी भी चीज़ में डालती हैं। गाय की हड्डी डालने से चीज़ देखने में इकसार लगती है (पीज़े में डलने से पहले)। मूर्खों को पढ़ने में दिक्कत न हो इसलिए पॆकिंग के ऊपर गाय की हड्डी को “कॆलसियम क्लोराईड” या “E 509” लिखा जाता है। हार्ड-चीज़ जैसी ही एक चीज़ होती जिसे परमिजान कहते हैं, कुछ लोगों को भ्रम है कि परमिजान शाकाहारी है, लेकिन ऐसा नही है। हाँ, शायद एक-आध कंपनी हैं जो कि गाय की आँतों की बजाए बकरे की आँत परमिजान-चीज़ में डालती हैं। लेकिन इसके आलावा और क्या-क्या है उस चीज़ में, इस बारे में मैं अभी संतुष्ट नहीं हूँ। बी.बी.सी. के रसोई वाले जाल पर परमिज़ान को शाकाहारी भाजन में शामिल किया गया है, लेकिन दूसरी जगह उन्होनें स्पष्ट कर दिया गया है कि परमिजान चीज़ हमेशा शाकाहारी नहीं होता। चीनी एक बात और बड़े मज़े कि आप से कहता हूँ। क्या आपने बचपन में किसी व्यक्ति से यह सुना था कि “चीनी” गाय की हड्डी से साफ करके बनाई जाती है? आप ने यह सोचा होगा कि वो व्यक्ति मूर्ख है? अगर साफ करने के लिए कोई हड्डी ही चाहिए तो भला गाय की क्यों? सच मानिये, मैंने भी यही सोचा था। लेकिन अफ़सोस, यह सच है। यह हमारे बचपन की बात नहीं है आज भी चीनी सिर्फ “गाय+सूअर” की हड्डी से ही साफ की जाती है। मैं उसी चीनी की बात कर रहा हूँ जो हम प्रति दिन खाते हैं, ख़ास तौर से भारत में, क्योंकि विदेशों में बिना साफ की हुई (भूरी) चीनी बाज़ार में आसानी से मिल जाती है। हम भारतीयों को ही सफेद चीनी खाने की कुछ ज्यादा आदत है। भूरी चीनी में गन्ध भी होती है इसलिए कुछलोग इसे पसंद नहीं करते। डेढ़ सौ साल पहले तक चीनी शाहाहारी थी लेकिन शायद उस समय भारत में चीनी होती ही नहीं थी। 1822 में एक नये अविष्कार के बाद चीनी मांसाहारी होनी शुरु हो गई। पहले चीनी लकड़ी के कोयले से रगड़ कर चीनी साफ़ करते थे। लेकिन गाय-सूअर की हड्डी-खाल का कोयला चीनी को ज्यादा अच्छी तरह साफ करता है, इसलिए अब केवल गाय-सूअर की हड्डी के कोयले का प्रयोग चीनी साफ करने के लिए होता है। आपने कभी वोदका की सफाई पर ग़ौर किया? बहुत-सी रूसी वोदका गाय-सूअर की हड्डी से बने जेलेटिन से साफ की जाती है, अर्थात् हिन्दुओं और मुसलमानों के लिए अभक्ष्य है। वर्क हम जो अपनी मिठाइयों को सजाने के लिए चाँदी की वर्क का इस्तेमाल करते हैं ये भी गोमांस से युक्त होती है। क्योंकि चाँदी को फैलाकर वर्क बनाने के लिए हथौड़ी से पीटा जाता है। आप अच्छी तरह से जानते हैं कि वर्क बहुत नाजुक होती है। अगर हथौड़ी का सीधा प्रहार करें तो वर्क टूट कर बिखर जाएगी, यदि किसी धातु या किसी और चीज की परत के बीच में रख कर पीटा जाए तो चाँदी धातु से इस प्रकार चिपक जाएगी कि फिर सिर्फ पिघला या खरोच कर ही अलग होगी। इसका अनुभव आप वर्क को छूकर कर सकते हैं। जब हम बर्क को छूते हैं तो हमारी अँगुली से बहुत बुरी (अच्छी) तरह चिपक जाती है। इस समयस्या का एक मात्र उपाय ये है कि चाँदि को गाय की आँतों में लपेट कर हथौड़े से पीटा जाये। इस लिए बर्क बनाने वाले इस एक मात्र उपाय का प्रयोग करते हैं। स्वयं को खुश करने के लिए, आपको ये कल्पना करने की कोई जरूरत नहीं है कि वर्क के तैयार होने पर उसे धोया या साफ किया जाता होगा। पनीर हम जो पनीर बाज़ार से ख़रीद कर खाते हैं वो भी भरोसेमन्द नहीं है। क्योंकि दूध फाड़ कर पनीर बनाने का जो सबसे सफल रसायन है, जिसका इस्तेमाल अधिकांश पेशेवर लोग करते हैं। वो वास्तव में रसायन नहीं बल्कि गाय के नवजात शिशु का पाचन तन्त्र है। अगर हम पनीर बनाने के लिए दूध में नीम्बू का रस, टाटरी या सिट्रिक एसिड डालते हैं तो दूध इतनी आसानी से नहीं फटता जितना कि उस अंजान रसायन से, फिर घरेलू पनीर में खटास भी होती है, बाज़ार के पनीर की तुलना में जल्दी खट्टा या ख़राब हो जाता है। इस रसायन की यही पहचान है कि पनीर जल्दी ख़राब या खट्टा नही होता, और हमारी सबसे बड़ी यह समस्या यह है कि किसी भी लेबोटरी टेस्ट से ये नही जाना जा सकता कि पनीर को बनाने के लिए गाय के शिशु की आँतों का इस्तेमाल किया गया है। क्योंकि गाय के शिशु की आँतें दूध के फटने पर पनीर से अलग हो कर पानी में चली जाती हैं। इसका बहुत कम (नहीं के बराबर) अंश ही पनीर में बचता है। यह पानी जो दूध फटने पर निकलता है इसे विदेशों में मट्ठा या छाज (why) कह कर बेचते हैं। प्रवासी हिन्दु भाई कृपा करके यह विदेशी मट्ठा कभी न ख़रीदें। इसलिए बाज़ारू पनीर (सभी प्रकार के पनीर) से भी सावधान रहें। दूध, क्रीम, मक्खन, दही तथा दही की तरह ही दूध से बने (खट्टे) उत्पादों के अतिरिक्त विदेशों में बिक रहे लगभग सभी अन्य दुग्ध-उत्पाद मांसाहारी हैं। ज्यादातर मरगारीन भी मांसाहारी ही है। इ-नम्बर (E-Numbers) ऐसे रसायन जिनकों खाद्य पदार्थों में मिलाया जाता है, इनकी संख्या आज 3000 से ज्यादा है। ऐसे ही बहुत से अनगिनत रसायन, वास्तव में रसायन नही जीवों का अंश है, लेकिन उन्हें वैज्ञानिक नाम या नम्बर दे दिये गए हैं। जैसे कि आजकल बहुत से खाद्य उत्पादों पर जहां उत्पाद में शामिल (ingredients or contains) पदार्थों (घटकों) की सूचि होती है, उन में कुछ रंग या रंगों के नम्बर भी लिखे होते हैं और कहीं-कहीं इ-नंबर (“E” Numbers) जैसे- E509, E542, E630-E635 वगैरह सिर्फ नम्बर भी लिखे होते हैं। ये सभी No. और ये नाम – calcium stearate, emulsifiers, enzymes, fatty acid, gelatin, glycerol, glycine, glyceryl, glyceral, leucine, magnesium stearate, mono and diglyceri, monostearates, oleic acid, olein, oxystearin, palmitin, palmitic acid, pepsin, polysorbates, rennet, spermaceti, stearin, triacetate, tween, vitamin D3 हमारे धर्म के लिए घातक हो सकते हैं। इन अन्जान नम्बरों और नामों से सदैव सावधान रहें। कोई भी ई-नंबर शाकाहारी है या मांसाहारी यह तो केवल वह कंपनी ही बता सकती है जिसने उसका उत्पाद या निर्माण किया है। क्योंकि एक ही ई-नंबर को कई तरह से बनाया जाता सकता है। एक ही ई-नंबर कोई कंपनी शाकाहारी फार्मूले से बनाती है और दूसरी कंपनी मांसाहारी फार्मूले से। एक और बात बड़े दुःख के साथ यहां बतानी पड़ेगी कि मधुमेह का इंसुलीन इंजेक्शन भी गाय-सूअर से ही बनता है। अभक्ष्य या मांसाहारी वनस्पति आजकल तो वनस्पति भी नॉनवेज है। जब साधारण भारतीय वनस्पति से जुड़े जेनेटिक शब्द को सुनता है तो उसके दिमाग में संकर शब्द आता है। वह सोचता है कि जेनेटिक संकर जैसा ही कोई शब्द है, दो विभिन्न वनस्पितयों के जीन मिलाकार कोई नई नस्ल की वनस्पति तैयार करते होंगे। लेकिन वास्तव में ऐसा नहीं है। आज विश्व बाजार में सवा सौ से अधिक वनस्पतियां ऐसी हैं जोकि पशुओं से संकरित हैं। यानि मांसाहारी हैं। ख़ास तौर से मांसाहारी टमाटर, आलु, बैंगन, शिमला मिर्च, फूल गोभी, बन्द गोभी आदि अधिक प्रचलन में हैं। सब्जी को अधिक गूदेदार बनाने के उद्देश्य से अधिकतर सब्जियां मांसाहारी बनाई गई हैं अर्थात् उन सब्जियों के बीज में मछली, गाय, सूअर आदि के अंश मिलए जाते है। लेकिन आलु में उस कीड़े के अंश मिलाए जाते हैं जो कीड़ा आलु की फसल को खाता या ख़राब करता है। जिससे की वो कीड़ा उस सजातीय आलु को न खाए। इन मांसाहारी सब्जियों की एक पहचान यह है कि इनको पकाते समय सुगंध के बजाय दुर्गंध आती है। लेकिन कई बार दुर्गंध साधारण सब्जी से भी आती है, ख़ास तौर से दिल्ली जैसे महानगरों में, क्योंकि कुछ किसान गन्दे (नाले के) पानी से अपने खेत की सिंचाई करते हैं। लोग इन मांसाहारी सब्जियों के लिए जर्मनी को जिम्मेदार मानते हैं, क्योंकि वहीं से सब शुरु हुआ। लेकिन मैं तो इस एक देश नहीं बल्की एक धर्म को इसके लिए दोषी मानता हूँ। फ़ास्ट-फ़ूड पहली बात यह है कि– फास्ट-फूड केवल पकाले या खाने में ही फास्ट हैं पचनें में “वॆरी स्लो”। हालांकि, फास्ट-फूड पकने से पहले भी बहुत धीमी प्रक्रिया से गुजरते हैं। विदेशी फ़ास्ट-फ़ूड वालों के यहां मसालेदार खाना भी होता है। आप शाकाहारी हों या नहीं इससे फर्क नहीं पड़ता, यदि आप हिन्दू हैं तो विदेशी मसाले या फारमूले वाला कोई (या कोई भी चीज जिससे आप पूरी तरह परिचित न हों) उत्पाद न खाएँ। चाहे वह विश्व प्रसिद्ध लेबल वाले फिंगर चिप्स हो या लाल लेबल वाला कोला पेय। यदि आप सोंचते हैं कि आप इन दोनो खाद्य पदार्थों से परिचित हैं और खातें हैं तो आप गलती पर हैं। इन दोनों का संयोग दुनिया में प्रसिद्ध है लेकिन यह दोनो ही मांसाहारी है। हालांकि इन दोनो पर शाकाहार का चिह्न भी है और मसालेदार भी नहीं, फिर भी मांसाहारी हैं। मैं जिस चिप्स की बात कर रहा हूँ उसमें गाय के अंश होते हैं इसलिए हम नहीं खा सकते। लेकिन पेय को पीया जा सकता हैं क्योंकि इसकी टक्कर धर्म नहीं शाकाहार से है। इस पेय में एक विशेष कीड़े को मिलाया जाता है जिससे कि लोग फिर लाल-लेबल वाले कोला को ही पीयें। आपने शायद गौर किया हो कि पेप्सी-कैम्पा या दूसरी कोला पीने वाले कट्टर नहीं होते वे अन्य किसी कंपनी की कोला भी पी सकते हैं। मगर लाल-लेबल वाली कोला पीने वाले को दूसरी किसी भी कोला में वो रस (कीड़े का स्वाद) नहीं मिलता इसलिए वे लोग नसेड़ियों की तरह केवल एक ही कंपनी की कोला पीते हैं। चिप्स के बारे में मैं आपको थोड़ा और बता देता हूँ। पहले यह कंपनी गाय की चर्बी में चिप्स तला करती थी। जैसा की आप जानते हैं कि किसी भी चर्बी में बहुत ज्यादा कैलेस्ट्रॉल होता है। जब लोगों की कॆलट्रॉल के प्रति जागरुकता बढ़ने लगी तो इस कंपनी ने चर्बी में चिप्स तलना छोड़ दिया। लेकिन लोगों को तेल के चिप्स में स्वाद नहीं आ सकता, इसलिए यह कंपनी गाय की चर्बी वाला गन्ध चिप्स में डालने लगी। यह गन्ध इस कंपनी का पूरी तरह से गुप्त अविष्कार है लेकिन प्राकृतिक है अर्थात् गाय की चर्बी से ही बना है। यहां प्रसंगवश बता दूँ की इनके आलू भी कोई आम नहीं होते। यह फ्रांस की एक ख़ास नस्ल के आलु होते हैं जिन्हे अमेरिका के अयोवा प्रान्त में उगाया जाता है। और खेत से आने के बाद एक बहुत लम्बी प्रक्रिया के बाद ये आलु तलने के लिए तैयार हो पाते हैं। इसी कारण पूरे वर्ष चिप्स का स्वाद एक जैसा रहता है। सारी समस्या की जड़ आखिर ये सारी समस्या क्यों और कैसे उत्पन्न हुई? क्योंकि इन मलेच्छों के धर्म में गाय या सूअर जैसी कोई समस्या तो है नहीं। और दूसरी बात- जैसे ही यह लोग धर्म स्वीकार करते हैं, मसीहा इनके सभी पाप अपने ऊपर ले लेते हैं। बस जो जी में आए करो। इनके बहुत से मिश्रित मसालो में गाय के भेज़े का चूर्ण या अण्डे के छिलके का चूर्ण, सूअर की चर्बी का चूर्ण या किसी अन्य पशु का चूर्ण होता है। ये इस बात की बिलकुल भी परवाह नहीं करते कि कोई हिन्दू या मुसलमान भी इनके उत्पाद को अन्जाने में खा सकता है। यदि इनके किसी खाद्य उत्पाद पर आप (ingredients or contains में) सब कुछ साधारण देखे मगर लिखा हो “मसाले” तो सवधान हो जाएँ। क्योंकि हमारे भगवान उनके मसीहा जैसे दयालु नहीं हैं, कि सारे पाप अपने ऊपर ले लें। पश्चिम के प्रताप से केक का बाजार बढता ही जा रहा है। और केक में जेलेटिन का उपयोग अभी भारत के फ़ैशन में है। हालांकि आमतौर से सभी मीठे ब्रॆड और केक मरगारीन से युक्त होते हैं। लोग आमतौर से समझते हैं कि संस्कार हीन या अधकच्चे मक्खन को मरगारीन कहते हैं। लेकिन सच्चाई कुछ और है, जिस प्रकार भारत में कुछ लोग भैंस और सूअर की चर्बी को दूध में मिलाकर दूध को वसायुक्त बनाते हैं। इसी प्रकार विदेशों में होता है लकिन वहां भैंस तो होती नहीं इसलिए गाय और सूअर की चर्बी दूग्ध-उत्पादों में मिलाते हैं, विशेष रूप से मरगारीन में। हमेशा याद रखें कि भारत में बिकने वाला दूध, दही, पनीर और मिठाई ही भारतीय हैं। घी, मक्खन और मरगारीन आदि भारत में बिकने वाले ज्यादातर डिब्बाबन्द या फॆक्ट्री दुग्ध उत्पाद के लिए कच्चा माल विदेशों से ही आता है। एक और बात – श्रेणी हमारी पश्चिमी दुनिया के अनुसार मुख्य रूप से चार प्रकार के शाकाहारी होते हैं। 1. Lacto-ovo vegetarianism वह लोग जो अण्डे और दूग्ध-उत्पाद खाते हैं लेकिन मीट, मच्छी नहीं खाते। 2. Lacto vegetarianism वह लोग जो दूग्ध-उत्पाद खाते हैं हम हिन्दू जिन्हें शाकाहारी मानते हैं। यह लोग मीट, मच्छी, अण्डे नहीं खाते। 3. Ovo vegetarianism वह लोग जो अण्डे तो खाते हैं मगर मीट, मच्छी और दूग्ध-उत्पाद नहीं खाते। 4. Veganism लोग जो शुद्ध शाकाहारी होते हैं। यह लोग दूध तो क्या शहद भी नहीं खाते। इस के अनुसार हम हिन्दू जो शाकाहार में विश्वास रखते हैं लेक्टो-वेज़ेटेरियनिज़्म (Lacto vegetarianism) के अन्तरगत आते हैं। क्योंकि हम शहद, दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन करते हैं। जैसे- दही, पनीर, मक्खन, घी, मट्ठा, क्रीम आदि। हम हिन्दुओं को शुद्ध शाकाहारी क्यों नहीं माना जाता? क्या दूध पीने में वास्तव में कोई दोष है? इस प्रश्न के बहुत से कारण हैं और उत्तर आप लोग जानते ही हैं, मगर एक कारण जो आप लोगों में से बहुत कम लोग जानते हैं वो मैं बताता हूँ। क्योंकि मैं वर्षों से पश्चिमी विदेशों में भ्रमण तथा निवास कर रहा हूँ। जैसे हिन्दू धर्म में नवरात्र, श्राद्धपक्ष, मलमास वगैरह कुछ ऐसे समय हैं जिनमें हम लोग आम दिनों की अपेक्षा अधिक शुद्ध-सात्विक भोजन करते हैं। इसी प्रकार ईसाई धर्म में भी है, वह लोग भी साल में कई बार और विशेष रूप से ईस्टर से पहले कुछ दिन (7 दिन या 40 दिन) ये लोग भी शाकाहारी रहते हैं। इन दिनों ये लोग दूध और दूध से बने पदार्थों का सेवन नहीं करते। शाकाहारी बने रहते हैं। इनमें से कुछ लोग यह भी मानते हैं कि गुरुवार को मछली खाने से मांसाहार का दोष नहीं लगता। एक करण और भी हो सकता है कि यह समस्या धर्म नहीं बल्की भाषा की हो। जैसे कि वेजेटेरियन को हिन्दी में शाकाहार कहते हैं यह तो सही है, लेकिन नॉनवेज को हिन्दी में मांसाहार कहते हैं ये गलत है। नॉनवेज का अर्थ मांसाहार नहीं बल्की अशाकाहार है, इस हिसाब से ठीक ही है, दूध नॉनवेज है। अँग्रेजी के हिसाब से तो हर वह वस्तु जो वनस्पति/शाक नहीं है नॉनवेज है। जैसे कि नमक और पानी जो पश्चिमी लोग शाकाहार के दिनो में खाते-पीते हैं। नमक और पानी ही क्यों, रेत-मिट्टी और वो माउस जो अभी आपके हाथ में है वो भी नॉनवेज है। निर्णय मैने पहले आरम्भ में ही लिखा था कि शाकाहार या मांसाहार असली समस्या नहीं है इसलिए जितनी चाहो कोला पीयो। लेकिन यदि हम हिन्दू धर्म में आस्था रखते हैं तो हमें किसी भी चीज को अपने (हिन्दू, सनातन) धर्म के अनुसार उसकी श्रेणी में रखना चाहिए। क्योंकि शाकाहार हमारा धर्म या साम्प्रदाय नहीं है। हमारा धर्म है सनातन (हिन्दू), साम्प्रदाय हमारा जो भी हो- शैव, शाक्त, वैष्णव या अन्य कोई भी। हमारे धर्म के अनुसार दूध पीने से हमें कोई दोष नहीं लगेगा। लेकिन अण्डा चाहे fertilised (चूजा निकालने योग्य देशी अण्डा) हो या न (चूजा नहीं निकालने वाला फ्रामी अण्डा) हो, हिन्दू धर्म के अनुसार इसे खाने में दोष है। परिहार यूं तो सप्ताह के 7 में से 5 दिन (रविवार, सोमवार, मंगलवार, गुरुवार, तथा शनिवार) दाढ़ी बनाने से भी दोष लगता है। कृष्ण जन्माष्टमी और शिवरात्री का वर्त न रखने से भी पाप लगता है। लेकिन ये दोष और पाप इतने गम्भीर नहीं हैं जितने कि पीज़ा या जेली केक खाने से लगते हैं। पीजा या जेली केक खाने के बाद तो हम उन सभी पापों से मुक्त हो जाते हैं जो हिन्दू धर्म हम पर लगाता है। क्योंकि हम अब मलेच्छ जो जाते हैं। अब हम स्वतन्त्र हैं, कुछ भी खा सकते हैं। क्योंकि हमने जेलेटिन खा लिया है। अब समस्या खुद को अशुद्धता से बचाने की नहीं, समस्या यह हो जाती है कि स्वयं को शुद्ध कैसे करें? प्रायश्चित कैसे करें? हिन्दू धर्म के अनुसार, यदि हम प्रायश्चित न करें तो दूसरे जन्म में दूषित योनि प्राप्त होगी या फिर शारीरिक दोषों से युक्त मनुष्य योनि मिलेगी। जिन पापों का यहां हम विचार कर रहें हैं उनके प्रायश्चित के लिए- चान्द्रायण व्रत, महासांतपन व्रत, सांतपन व्रत, गौदान इत्यादि करना चाहिए।

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